Friday, January 1, 2010

















आपके जीवन में खुशियाँ ले कर आये नूतन वर्ष ......


सुबह में बंद खिड़की के दरख्तों से आती धुप की तरह....


सर्द ठंडी हवा में घुली गेंदे की खुशबु की तरह...


फूलो से लदी गुलमोहर की डाली से टपकती ओस की बूंदों की तरह...



इंतजार.......

बागो में खिली फूल इंतजार करती हो जैसे भंवरों का

सावन में झूमता पोअधा इंतजार करता हो जैसे बादलों का

रातों को जुगनूँ जल-बुझ कर इंतजार करती हो जैसे प्रियतम का

वैसे ही नव वर्ष इंतजार कर रही है आपका....

Monday, October 19, 2009

बदलाव....













मन
में एक उमंग है जगी सी.........

हर चीज़ अब लगे है नई सी......

भूल
गया था जिस हंसी को ,

लौट
आई है वो चांदनी सी......

अकेले
में गुनगुनाने लगा हूँ,

फिर हवाओं से बतियाने लगा हूँ,

कुछ हुआ ही नहीं था जैसे,

सब भूल सा गया हूँ.....

क्या
किसी के मुश्कुराहटो का इतना भी असर होता है?????

जान गया हूँ मैं,

जिंदगी ख़त्म नहीं होती किसी के जाने से.....


जिंदगी तो बस नित रंग बदलती है किसी न किसी बहाने से.....

जिंदगी
तो बस नित रंग बदलती है किसी न किसी बहाने से....

Friday, October 16, 2009

दिया जलाने चला हूँ मैं...















आज
फिर से दिया जलाने चला हूँ मैं...


सो चुके जज्बातों को फिर से जगाने चला हूँ मैं...

अब..न रखना मुझसे शिकायत ऐ जिन्दगी ..


आज अंधेरों से तुझे उजालों में ले जाने चला हूँ मैं...

आज फिर से दिया जलाने चला हूँ मैं...

Tuesday, September 1, 2009

"क्योँ ".....



















क्यों
बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!

क्यों ख्वाबो में भी तेरी यादों को ढूंढ़ता है..... मेरा मन!


परछाइयां
जो दिखती है मेरी
कभी
जो उजालों में;

क्यों तेरे होने का एहसास करा जाता है... मेरा मन!

बहुत सोचा की तेरा साथ एक इतेफाक था;


क्यों आज भी तेरी याद हर ख़ुशी और गम में दिला जाता है...मेरा मन!


परेशां हूँ मैं इस क्यों से जबसे छुटा है तेरा साथ;


क्यों आज तक न दूँढ पाया इस "क्योँ " का जबाब.... मेरा मन!

क्यों बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!

क्यों ख्वाबो में भी तेरी यादों को ढूंढ़ता है..... मेरा मन!

Wednesday, July 1, 2009

यादें........



















दोस्त
बिछुड़कर भी यादों में रहेंगीं आप,

दूर होकर भी अहसासों में बसेंगी आप ,

जो फुर्सत में बैठूँगा कभी अकेला ,

दूर कहीं सन्नाटे में नजर आयेंगीं आप,

आपकी
हंसी यादों में जब-जब आएगी,


आसुओं की बरसात हमें भीगो जायेगी....

आपका वो रूठना-मनाना,

हमारा वो लड़ना-झगड़ना ,

कौंध जायेगा जेहन में हमारे.........

जो
कभी पलटुंगा किताबें पुरानी,


उसमे
अंकित आपकी यादें काफी होंगी हमें तनहाइयों में ले जाने को....


जो कभी गुजरुंगा उन रास्तों से,

जिनपे
साथ थे हम चले कभी ,

वो बार-बार अहसास करायेंगी आपके साथ न होने का......

सच मानिये!!!!!!!! मुश्किल ही नहीं तब नामुमकिन होगा आसुओं को रोक पाना.....

दोस्त
बिछुड़कर भी यादों में रहेंगीं आप,


दूर होकर भी अहसासों में बसेंगी आप ,

Wednesday, June 17, 2009

तुमसे कहना है ये...........















हर
बार की तरह इस बार भी कहा है तुमने क्यों नहीं भूल जाते हो मुझे?

तुमसे कहना है ये...........



आँखों में जो इतना नमी रखोगी मेरे लिए,

क्या भूल पाउँगा मैं तुम्हे सिर्फ तुम्हारे ज़माने के लिए....


ख्वाबो में जो कभी गूंजती है हंसी तुम्हारी मेरे लिए,

क्या नहीं देख पाउँगा अब ख्वाबो में भी तुम्हे,

सिर्फ तुम्हारे ज़माने के लिए.....

हर वो लम्हा मुझे प्यारी है जिससे जुडी है यादें तुम्हारी मेरे लिए,

क्या याद भी कर पाउँगा उन लम्हों में तुम्हे,

सिर्फ तुम्हारे ज़माने के लिए.....

अब!!!!! बस भी करो कहना की भूल जाओ मुझे,

कहीं भूलते- भूलते खुद ही भुला जाऊँ इस भीड़ में सिर्फ तुम्हारे ज़माने के लिए.....

Tuesday, June 9, 2009

एक बेटी का प्रश्न मम्मी से.........




















उसने
अपने घर में कहा...''मेरी दोस्ती एक लड़के से है.''

घर
में विस्मय से सबने कहा लड़के से!!!!!!!

तभी
मम्मी ने कहा....''तुमसे हमने कहा था लड़को से दोस्ती करना, फिर यह क्या है.''

मम्मी वो उस तरह का लड़का नहीं जैसा आप सोचती हैं,

वो
मेरा दोस्त है सिर्फ दोस्त,क्या दोस्ती में लड़का-लड़की का भेद किया जाता है?

बेटी
ने प्रश्न किया...

मम्मी
थोडी देर चुप रहीं....फिर बोली...

''
बेटी दोस्ती सिर्फ दोस्ती होती है उसमे कोई भेद नहीं,

लेकिन
समाज इस दोस्ती को बुरी नजर से देखता है''

बेटी
ने फिर प्रश्न किया...''क्या समाज हम से ही बनता है?''

हाँ
मम्मी ने कहा.... तब उसने पलट कर फिर प्रश्न किया...

''
क्या हम नहीं बदल सकते?''

मम्मी
सतब्ध थीं..क्योंकि वो भी औरत है,

उन्हें
भी झेलना पड़ा है इन सब प्रश्नों को...

फिर
भी मम्मी ने अपने भावो को छुपाते हुय कहा....

''
आज के बाद उस लड़के से तुम्हारी दोस्ती नहीं रहेगी बस!''

बेटी
रो पड़ी उसने रोते हुए कहा...

''
मम्मी क्या मेरी जगह भइया होता और आपसे कहता मुझे किसी लड़की से दोस्ती है तो क्या आप उसे भी ऐसा ही कहती?''

मम्मी
बेटी के प्रश्न को सुनकर चुप हो गई.

तभी
एक 'तमाचा'!!!''लड़कियों का अधिकार नहीं प्रश्न करना''

मम्मी
ने कहा और रोते हुए अपने कमरे में में चली गईं ...

बेटी
एकटक उन्हें देखती रही वो मम्मी को दोष दे,

समाज
को या खुद को प्रश्न अनुत्तर रह गया....

Tuesday, June 2, 2009

क्यूं....
















क्यूं
....ये बेताबी है तुम्हे देखने की,


क्यूं...ये बेचैनी है तुम्हे पाने की,


क्यूं....मेरे सपने में आती हो,


क्यूं.....दूर होकर भी पास नजर आती हो,


शायद! अब बिछुड़ने को हो...


इसलिए बहुत याद आती हो!!!!!!!!!!