Monday, October 19, 2009

बदलाव....













मन
में एक उमंग है जगी सी.........

हर चीज़ अब लगे है नई सी......

भूल
गया था जिस हंसी को ,

लौट
आई है वो चांदनी सी......

अकेले
में गुनगुनाने लगा हूँ,

फिर हवाओं से बतियाने लगा हूँ,

कुछ हुआ ही नहीं था जैसे,

सब भूल सा गया हूँ.....

क्या
किसी के मुश्कुराहटो का इतना भी असर होता है?????

जान गया हूँ मैं,

जिंदगी ख़त्म नहीं होती किसी के जाने से.....


जिंदगी तो बस नित रंग बदलती है किसी न किसी बहाने से.....

जिंदगी
तो बस नित रंग बदलती है किसी न किसी बहाने से....

Friday, October 16, 2009

दिया जलाने चला हूँ मैं...















आज
फिर से दिया जलाने चला हूँ मैं...


सो चुके जज्बातों को फिर से जगाने चला हूँ मैं...

अब..न रखना मुझसे शिकायत ऐ जिन्दगी ..


आज अंधेरों से तुझे उजालों में ले जाने चला हूँ मैं...

आज फिर से दिया जलाने चला हूँ मैं...

Tuesday, September 1, 2009

"क्योँ ".....



















क्यों
बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!

क्यों ख्वाबो में भी तेरी यादों को ढूंढ़ता है..... मेरा मन!


परछाइयां
जो दिखती है मेरी
कभी
जो उजालों में;

क्यों तेरे होने का एहसास करा जाता है... मेरा मन!

बहुत सोचा की तेरा साथ एक इतेफाक था;


क्यों आज भी तेरी याद हर ख़ुशी और गम में दिला जाता है...मेरा मन!


परेशां हूँ मैं इस क्यों से जबसे छुटा है तेरा साथ;


क्यों आज तक न दूँढ पाया इस "क्योँ " का जबाब.... मेरा मन!

क्यों बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!

क्यों ख्वाबो में भी तेरी यादों को ढूंढ़ता है..... मेरा मन!

Wednesday, July 1, 2009

यादें........



















दोस्त
बिछुड़कर भी यादों में रहेंगीं आप,

दूर होकर भी अहसासों में बसेंगी आप ,

जो फुर्सत में बैठूँगा कभी अकेला ,

दूर कहीं सन्नाटे में नजर आयेंगीं आप,

आपकी
हंसी यादों में जब-जब आएगी,


आसुओं की बरसात हमें भीगो जायेगी....

आपका वो रूठना-मनाना,

हमारा वो लड़ना-झगड़ना ,

कौंध जायेगा जेहन में हमारे.........

जो
कभी पलटुंगा किताबें पुरानी,


उसमे
अंकित आपकी यादें काफी होंगी हमें तनहाइयों में ले जाने को....


जो कभी गुजरुंगा उन रास्तों से,

जिनपे
साथ थे हम चले कभी ,

वो बार-बार अहसास करायेंगी आपके साथ न होने का......

सच मानिये!!!!!!!! मुश्किल ही नहीं तब नामुमकिन होगा आसुओं को रोक पाना.....

दोस्त
बिछुड़कर भी यादों में रहेंगीं आप,


दूर होकर भी अहसासों में बसेंगी आप ,

Wednesday, June 17, 2009

तुमसे कहना है ये...........















हर
बार की तरह इस बार भी कहा है तुमने क्यों नहीं भूल जाते हो मुझे?

तुमसे कहना है ये...........



आँखों में जो इतना नमी रखोगी मेरे लिए,

क्या भूल पाउँगा मैं तुम्हे सिर्फ तुम्हारे ज़माने के लिए....


ख्वाबो में जो कभी गूंजती है हंसी तुम्हारी मेरे लिए,

क्या नहीं देख पाउँगा अब ख्वाबो में भी तुम्हे,

सिर्फ तुम्हारे ज़माने के लिए.....

हर वो लम्हा मुझे प्यारी है जिससे जुडी है यादें तुम्हारी मेरे लिए,

क्या याद भी कर पाउँगा उन लम्हों में तुम्हे,

सिर्फ तुम्हारे ज़माने के लिए.....

अब!!!!! बस भी करो कहना की भूल जाओ मुझे,

कहीं भूलते- भूलते खुद ही भुला जाऊँ इस भीड़ में सिर्फ तुम्हारे ज़माने के लिए.....

Tuesday, June 9, 2009

एक बेटी का प्रश्न मम्मी से.........




















उसने
अपने घर में कहा...''मेरी दोस्ती एक लड़के से है.''

घर
में विस्मय से सबने कहा लड़के से!!!!!!!

तभी
मम्मी ने कहा....''तुमसे हमने कहा था लड़को से दोस्ती करना, फिर यह क्या है.''

मम्मी वो उस तरह का लड़का नहीं जैसा आप सोचती हैं,

वो
मेरा दोस्त है सिर्फ दोस्त,क्या दोस्ती में लड़का-लड़की का भेद किया जाता है?

बेटी
ने प्रश्न किया...

मम्मी
थोडी देर चुप रहीं....फिर बोली...

''
बेटी दोस्ती सिर्फ दोस्ती होती है उसमे कोई भेद नहीं,

लेकिन
समाज इस दोस्ती को बुरी नजर से देखता है''

बेटी
ने फिर प्रश्न किया...''क्या समाज हम से ही बनता है?''

हाँ
मम्मी ने कहा.... तब उसने पलट कर फिर प्रश्न किया...

''
क्या हम नहीं बदल सकते?''

मम्मी
सतब्ध थीं..क्योंकि वो भी औरत है,

उन्हें
भी झेलना पड़ा है इन सब प्रश्नों को...

फिर
भी मम्मी ने अपने भावो को छुपाते हुय कहा....

''
आज के बाद उस लड़के से तुम्हारी दोस्ती नहीं रहेगी बस!''

बेटी
रो पड़ी उसने रोते हुए कहा...

''
मम्मी क्या मेरी जगह भइया होता और आपसे कहता मुझे किसी लड़की से दोस्ती है तो क्या आप उसे भी ऐसा ही कहती?''

मम्मी
बेटी के प्रश्न को सुनकर चुप हो गई.

तभी
एक 'तमाचा'!!!''लड़कियों का अधिकार नहीं प्रश्न करना''

मम्मी
ने कहा और रोते हुए अपने कमरे में में चली गईं ...

बेटी
एकटक उन्हें देखती रही वो मम्मी को दोष दे,

समाज
को या खुद को प्रश्न अनुत्तर रह गया....

Tuesday, June 2, 2009

क्यूं....
















क्यूं
....ये बेताबी है तुम्हे देखने की,


क्यूं...ये बेचैनी है तुम्हे पाने की,


क्यूं....मेरे सपने में आती हो,


क्यूं.....दूर होकर भी पास नजर आती हो,


शायद! अब बिछुड़ने को हो...


इसलिए बहुत याद आती हो!!!!!!!!!!

Tuesday, May 26, 2009

धोखा.......
















धोखा
दिया है तुमने मेरे आस को.......

तोडा है तुमने मेरे बिश्वास को.......

मंजिल तो ही गयी थी...

बस! हाथ छुडा कर तुमने नया रास्ता चुन लिया है....

सोचा
भी नहीं एक पल की टूट जाऊंगा मैं ....

ख्वाब
जो दिखाया था तुमने कैसे साकार कर पाउँगा मैं....

वादों का क्या हुआ??????

तुम्हारी तो धड़कने भी नहीं चलती थी मेरे बिना....

ख्वाबो में गर आऊँ तो सो भी नहीं पाती थी तुम मेरे बिना........

सब झूठ था !!!!........

सिर्फ इक बार तुम कह दो अपनी जुबानी.....

सिर्फ इक तुम कह दो अपनी जुबानी...........

Wednesday, May 13, 2009

माँ..........


















माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......


हर
शब्द तुम्हारी दासी है...

ममता
की मूरत, करुणा की देवी,

त्याग
की प्रतिमूर्ति, हर दर्द जो सहले हंसते -हंसते,

और न जाने कितने शब्द गढें हैं कवियों ने तुम्हे समझाने को

फिर भी यह सब लगे अधुरा,

क्यों मुझे तुम्हे समझाने को

माँ
....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में.....

हर शब्द तुम्हारी दासी है.......

कैसे
तुमने धीरज रखा जब आया मैं इस धरती पे

कैसे
व्यक्त करूँ मैं इसे शब्दों में

की कैसे तुमने मुझे पाला शैशव में

माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......

हर
शब्द तुम्हारी दासी है...

जब तुमने मुझे ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया

'मम' को मम्मी और 'पापा' बोलना सिखाया

इसे कैसे ढालूं मैं शब्दों में

जो तुमने मुझे इस दुनिया से साझात्कर कराया

माँ
....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......

हर शब्द तुम्हारी दासी है...

Thursday, April 23, 2009

एकटक सी देखती आँखों में.....


















एकटक सी देखती आँखों में.....

बस जाने को जी चाहता है,

तेरी पलकों के झुकने से पहले.....

सजदे में सर झुकाने को जी चाहता है,

लौट ना जाओ तुम हर बार की तरह.....

आज तो बाहों में भरने को जी चाहता है,

तुम्हारी मुस्कुराहटों में बिखरी हो जैसे चांदनी.....

कैद कर लूं इन लम्हों को यादों में जी चाहता है,

तुम्हारे बिन सुनी लगती है ज़िन्दगी.....

हो जो मुमकिन तेरे हुस्न के आगोश में मरने को जी चाहता है,

एकटक सी देखती आँखों में.....

बस जाने को जी चाहता है!

Monday, April 20, 2009

दोस्ती.....'एक अनकही अनुभूति'



दूर किसी शहर में रहते थे चार दोस्त ,

न ज़माने की फिकर न अपनों का ख्याल,

बस ख्वाबो में जीना सीखा था उन्होंने, रूठना-मनाना,

मिलना-बिछुड़ना और कैसे रखें एक दुसरे का ख्याल,

बस यही तो खेल था उन सिरफिरों का.

किसी को पता ही नहीं था,

क्या होती है ऊँच -नीच और क्या मायने है लड़का और लड़की होने के पर ज़माने ने जब एहसास कराया ,

तब तक बहुत दूर निकल चुके थे वो लोग .

बहुत विरोध किया उनलोगों ने,

किसी ने कहा.'कोई कुछ भी कहे हम ठीक तो जग ठीक'


तो किसी ने कहा..'मुझे परवाह नहीं ज़माने की'.

सब जानते थे हम हार जायेंगे ज़माने के आगे,

किसी की हिम्मत न थी सच को स्वीकारने की.

फिर चारो ने मिलकर एक रास्ता निकाला,

इस दोस्ती को मन के आँगन में 'तुलसी' समान बिठाया.

परन्तु, जब बिछुरन की चिलचिलाती धुप सुखाने लगती है 'तुलसी' को मन चारो का बेचैन हो जाता है

'सावन की फुहारों '[मिलन] के लिए...