Thursday, April 23, 2009

एकटक सी देखती आँखों में.....


















एकटक सी देखती आँखों में.....

बस जाने को जी चाहता है,

तेरी पलकों के झुकने से पहले.....

सजदे में सर झुकाने को जी चाहता है,

लौट ना जाओ तुम हर बार की तरह.....

आज तो बाहों में भरने को जी चाहता है,

तुम्हारी मुस्कुराहटों में बिखरी हो जैसे चांदनी.....

कैद कर लूं इन लम्हों को यादों में जी चाहता है,

तुम्हारे बिन सुनी लगती है ज़िन्दगी.....

हो जो मुमकिन तेरे हुस्न के आगोश में मरने को जी चाहता है,

एकटक सी देखती आँखों में.....

बस जाने को जी चाहता है!

Monday, April 20, 2009

दोस्ती.....'एक अनकही अनुभूति'



दूर किसी शहर में रहते थे चार दोस्त ,

न ज़माने की फिकर न अपनों का ख्याल,

बस ख्वाबो में जीना सीखा था उन्होंने, रूठना-मनाना,

मिलना-बिछुड़ना और कैसे रखें एक दुसरे का ख्याल,

बस यही तो खेल था उन सिरफिरों का.

किसी को पता ही नहीं था,

क्या होती है ऊँच -नीच और क्या मायने है लड़का और लड़की होने के पर ज़माने ने जब एहसास कराया ,

तब तक बहुत दूर निकल चुके थे वो लोग .

बहुत विरोध किया उनलोगों ने,

किसी ने कहा.'कोई कुछ भी कहे हम ठीक तो जग ठीक'


तो किसी ने कहा..'मुझे परवाह नहीं ज़माने की'.

सब जानते थे हम हार जायेंगे ज़माने के आगे,

किसी की हिम्मत न थी सच को स्वीकारने की.

फिर चारो ने मिलकर एक रास्ता निकाला,

इस दोस्ती को मन के आँगन में 'तुलसी' समान बिठाया.

परन्तु, जब बिछुरन की चिलचिलाती धुप सुखाने लगती है 'तुलसी' को मन चारो का बेचैन हो जाता है

'सावन की फुहारों '[मिलन] के लिए...

Saturday, April 18, 2009

लड़की का जन्म.......


मैं देख रहा था...एक अजीब दृश्य एक परिवार का,

वहाँ पसरा मरघटी सन्नाटा,

एक दुसरे से नजरे चुराती आँखे. मैं सोचता हूँ.. ये सन्नाटा क्योँ?

रात ही तो जन्म लिया है इनके घर लड़की ने,

लड़की ने मेरे मन ने दोहराया शब्द,

मैं समझ गया क्यों पसरा है सन्नाटा,

तभी मेरी नजर कमरे की बायीं ओर पड़ी माँ दुर्गे की मूर्ति पर जाती है,

जिसके सामने हाथ जोड़े खड़ी एक औरत माँग रही माँ से एक बेटा,

मैं सोचता हूँ माँ दुर्गा भी तो औरत है,

क्या वह नहीं समझ रहीं बेटा माँग कर किया जा रहा उन्हें तिरस्कृत,

यह कैसी बिडंवना माँ की अर्चना में छुपी है माँ की वंचना...

मैं देख रहा था एक अजीब दृश्य एक परिवार का,

वहाँ पसरा मरघटी सन्नाटा,

एक दुसरे से नजरे चुराती आँखे........

Friday, April 17, 2009

भ्रम........














इस अधूरे जहान में अपने लिये मुक्कम्मल जहां ढूँढने चला था,

जान कर भी की नामुमकिन है ये,

कदम दर कदम बढाता ही चला गया,

कभी लगता की मंजिल पास है,

तो कभी लगता की फासला अभी बचा है,

भ्रम था यह हमारा,

क्या किसी को मुक्कम्मल जहान मिली है?

बस! हम तो चलने के आदि हैं,

इसलिए भ्रम में चलते ही जा रहे थे,

चलते ही जा रहे हैं.............

दर्द














दर्द के बाद भी गर सीने में कुछ बचा हो ,

तो उसे क्या कहें.....

उनके जाने के बाद भी गर दरवाजे पर नज़र टिकी हो,

तो उसे क्या कहें.....

हम तो वैसे भी किसी के हमसफ़र ना बन सके,

गर जो कोई हमसफ़र बन कर सरे राह छोड़ दे,

तो उसे क्या कहें.....

वैसे याद तो आती है वो बरबस सूनी रातों में,

गर जो हिचकियों में याद आने लगे,

तो उसे क्या कहें.....

उन्हें भुलाने की कोशिश में,

क्या क्या ना दिल को समझाया,

गर जो दिल नासमझ हो,

तो उसे क्या कहें.....

दर्द के बाद भी गर सीने में कुछ बचा हो,

तो उसे क्या कहें....

Thursday, April 16, 2009

कभी ख़त्म न होगी


प्रतीक्षा....कभी ख़त्म न होगी उनके आने की,

उत्कंठा
....कभी ख़त्म न होगी उनको देखने की,

आभा....कभी ख़त्म न होगी उनके चेहरे की,

अनुभव....कभी ख़त्म न होगी उनके स्नेह की,

सार्थकता....कभी ख़त्म न होगी उनके होने की,

समर्पण....कभी ख़त्म न होगी उनके जाने से,

'कुंदन'....कभी ख़त्म न होगा उनके बगैर आने के..