Friday, April 17, 2009

दर्द














दर्द के बाद भी गर सीने में कुछ बचा हो ,

तो उसे क्या कहें.....

उनके जाने के बाद भी गर दरवाजे पर नज़र टिकी हो,

तो उसे क्या कहें.....

हम तो वैसे भी किसी के हमसफ़र ना बन सके,

गर जो कोई हमसफ़र बन कर सरे राह छोड़ दे,

तो उसे क्या कहें.....

वैसे याद तो आती है वो बरबस सूनी रातों में,

गर जो हिचकियों में याद आने लगे,

तो उसे क्या कहें.....

उन्हें भुलाने की कोशिश में,

क्या क्या ना दिल को समझाया,

गर जो दिल नासमझ हो,

तो उसे क्या कहें.....

दर्द के बाद भी गर सीने में कुछ बचा हो,

तो उसे क्या कहें....

3 comments:

Ravi Prakash said...

क्या कहूं तुम्हारी इस कविता को, दिल को छूती है तुम्हारी ये कविता

dezy said...

DARD AUR DIL KA RISTA KAFI PURANA HAI.TUMHARI DARD KI KAVITA SACH ME EK DARD BHARI SACCHAI HAI.

sharan said...

kuch khone ke baad hi kuch paya jata agar pyar ka sahi matlab pata chal tha hai
हम तो वैसे भी किसी के हमसफ़र ना बन सके,
गर जो कोई हमसफ़र बन कर सरे राह छोड़ दे,
to jindagi ki nayi shuruaat karo
or waise bhi dil hai to dard to hoga hi...........
sach me yaar bahut dil se kavita likhte ho
kyun itna jyada dard bhara hai aapki kavitaoo me???