Saturday, April 18, 2009

लड़की का जन्म.......


मैं देख रहा था...एक अजीब दृश्य एक परिवार का,

वहाँ पसरा मरघटी सन्नाटा,

एक दुसरे से नजरे चुराती आँखे. मैं सोचता हूँ.. ये सन्नाटा क्योँ?

रात ही तो जन्म लिया है इनके घर लड़की ने,

लड़की ने मेरे मन ने दोहराया शब्द,

मैं समझ गया क्यों पसरा है सन्नाटा,

तभी मेरी नजर कमरे की बायीं ओर पड़ी माँ दुर्गे की मूर्ति पर जाती है,

जिसके सामने हाथ जोड़े खड़ी एक औरत माँग रही माँ से एक बेटा,

मैं सोचता हूँ माँ दुर्गा भी तो औरत है,

क्या वह नहीं समझ रहीं बेटा माँग कर किया जा रहा उन्हें तिरस्कृत,

यह कैसी बिडंवना माँ की अर्चना में छुपी है माँ की वंचना...

मैं देख रहा था एक अजीब दृश्य एक परिवार का,

वहाँ पसरा मरघटी सन्नाटा,

एक दुसरे से नजरे चुराती आँखे........

4 comments:

sangam ''karmyogi'' said...

acchi pehal hai..
pata nai ye samajik vishyon pe sirf ek soch hai ya sahi me aapka najariya..
jo bhi hai...uchit hai..sarahniye hai!

seema gupta said...

बेटी के जन्म का ये द्रश्य ऑंखें नम कर गया....
regards

Ravi Prakash said...

बहुत ही सहजता पूर्वक लिखी गयी, परन्तु अंतरात्मा को झकझोरती है ये रचना

vandana said...

bahut hi khoobsoorati se ladki ke janam ka dard bayan kiya hai.......aapki soch lajawab hai.