Monday, April 20, 2009

दोस्ती.....'एक अनकही अनुभूति'



दूर किसी शहर में रहते थे चार दोस्त ,

न ज़माने की फिकर न अपनों का ख्याल,

बस ख्वाबो में जीना सीखा था उन्होंने, रूठना-मनाना,

मिलना-बिछुड़ना और कैसे रखें एक दुसरे का ख्याल,

बस यही तो खेल था उन सिरफिरों का.

किसी को पता ही नहीं था,

क्या होती है ऊँच -नीच और क्या मायने है लड़का और लड़की होने के पर ज़माने ने जब एहसास कराया ,

तब तक बहुत दूर निकल चुके थे वो लोग .

बहुत विरोध किया उनलोगों ने,

किसी ने कहा.'कोई कुछ भी कहे हम ठीक तो जग ठीक'


तो किसी ने कहा..'मुझे परवाह नहीं ज़माने की'.

सब जानते थे हम हार जायेंगे ज़माने के आगे,

किसी की हिम्मत न थी सच को स्वीकारने की.

फिर चारो ने मिलकर एक रास्ता निकाला,

इस दोस्ती को मन के आँगन में 'तुलसी' समान बिठाया.

परन्तु, जब बिछुरन की चिलचिलाती धुप सुखाने लगती है 'तुलसी' को मन चारो का बेचैन हो जाता है

'सावन की फुहारों '[मिलन] के लिए...

1 comment:

Babli said...

बहुत बढ़िया!