Friday, April 17, 2009

भ्रम........














इस अधूरे जहान में अपने लिये मुक्कम्मल जहां ढूँढने चला था,

जान कर भी की नामुमकिन है ये,

कदम दर कदम बढाता ही चला गया,

कभी लगता की मंजिल पास है,

तो कभी लगता की फासला अभी बचा है,

भ्रम था यह हमारा,

क्या किसी को मुक्कम्मल जहान मिली है?

बस! हम तो चलने के आदि हैं,

इसलिए भ्रम में चलते ही जा रहे थे,

चलते ही जा रहे हैं.............

4 comments:

sangam ''karmyogi'' said...

wah maharaj...
urdu shabdo se susajjit kiya hai aapne is shanika ko..!
aapko mukammal jahan jarur nasib hoga..

divya said...

u r awesome dearrrr
really proud of u
bye

Ravi Prakash said...

इस अधूरे जहान में.........मुक्कम्मल जहाँ की तलाश में हम सभी चल रहे हैं, इसे इस रूप में प्रस्तुत करने के लिए तुम वाकई तारीफ़ के काबिल हो

Rajeev said...

"mai to bas chalne ka aadi hu" waah....bahut khub. ek positive soch.keep it up.