Tuesday, May 26, 2009

धोखा.......
















धोखा
दिया है तुमने मेरे आस को.......

तोडा है तुमने मेरे बिश्वास को.......

मंजिल तो ही गयी थी...

बस! हाथ छुडा कर तुमने नया रास्ता चुन लिया है....

सोचा
भी नहीं एक पल की टूट जाऊंगा मैं ....

ख्वाब
जो दिखाया था तुमने कैसे साकार कर पाउँगा मैं....

वादों का क्या हुआ??????

तुम्हारी तो धड़कने भी नहीं चलती थी मेरे बिना....

ख्वाबो में गर आऊँ तो सो भी नहीं पाती थी तुम मेरे बिना........

सब झूठ था !!!!........

सिर्फ इक बार तुम कह दो अपनी जुबानी.....

सिर्फ इक तुम कह दो अपनी जुबानी...........

Wednesday, May 13, 2009

माँ..........


















माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......


हर
शब्द तुम्हारी दासी है...

ममता
की मूरत, करुणा की देवी,

त्याग
की प्रतिमूर्ति, हर दर्द जो सहले हंसते -हंसते,

और न जाने कितने शब्द गढें हैं कवियों ने तुम्हे समझाने को

फिर भी यह सब लगे अधुरा,

क्यों मुझे तुम्हे समझाने को

माँ
....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में.....

हर शब्द तुम्हारी दासी है.......

कैसे
तुमने धीरज रखा जब आया मैं इस धरती पे

कैसे
व्यक्त करूँ मैं इसे शब्दों में

की कैसे तुमने मुझे पाला शैशव में

माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......

हर
शब्द तुम्हारी दासी है...

जब तुमने मुझे ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया

'मम' को मम्मी और 'पापा' बोलना सिखाया

इसे कैसे ढालूं मैं शब्दों में

जो तुमने मुझे इस दुनिया से साझात्कर कराया

माँ
....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......

हर शब्द तुम्हारी दासी है...