Wednesday, May 13, 2009

माँ..........


















माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......


हर
शब्द तुम्हारी दासी है...

ममता
की मूरत, करुणा की देवी,

त्याग
की प्रतिमूर्ति, हर दर्द जो सहले हंसते -हंसते,

और न जाने कितने शब्द गढें हैं कवियों ने तुम्हे समझाने को

फिर भी यह सब लगे अधुरा,

क्यों मुझे तुम्हे समझाने को

माँ
....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में.....

हर शब्द तुम्हारी दासी है.......

कैसे
तुमने धीरज रखा जब आया मैं इस धरती पे

कैसे
व्यक्त करूँ मैं इसे शब्दों में

की कैसे तुमने मुझे पाला शैशव में

माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......

हर
शब्द तुम्हारी दासी है...

जब तुमने मुझे ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया

'मम' को मम्मी और 'पापा' बोलना सिखाया

इसे कैसे ढालूं मैं शब्दों में

जो तुमने मुझे इस दुनिया से साझात्कर कराया

माँ
....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......

हर शब्द तुम्हारी दासी है...

20 comments:

Babli said...

बहुत बहुत धन्यवाद आपकी टिपण्णी के लिए!
मुझे आपका ये कविता बेहद पसंद आया! माँ हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं! आज माँ की वजह से ही हम इस दुनिया में कदम रखे हैं! बहुत ही सुंदर लिखा है आपने !

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सचमुच मां को शब्दों में बांधना आसान नहीं. सुन्दर कविता, बधाई.

satish kundan said...

१]धन्यबाद बबली जी

२]धन्यबाद वंदना जी आशा है आगे भी आते रहेंगे मेरे ब्लॉग पर

raj said...

माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......sahi baat hai ma ke bare me jitna bhi likhe kam hai...kaise shabdo me bande??

satish kundan said...

शुक्रिया राज जी..

sangam ''karmyogi'' said...

jis maa ne srijan kiya sansar ka..
us maa ko pranam!
aapka jawab nahi hai..atiuttam!

अमिताभ भूषण "अनहद" said...

माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......

हर शब्द तुम्हारी दासी है...
उम्दा ,भावपूर्ण,क्या बात है .बस लिखते रहिये

*KHUSHI* said...

Maa.... jitna likhe utna kam.. Maa ke liye aapne shabdo ke jariye acchi rachna likhi hai...

रवीन्द्र दास said...

khushi hui k aap hamse jude
aur achchhi lagi aapki kavitaen.

अभिन्न said...

माँ जो भगवान् का साक्षात् रूप होती है आपने बहुत ही काव्यात्मक दंग से उसकी महिमा का वर्णन किया है
माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......
हर शब्द तुम्हारी दासी है...
......बहुत बधाई हो आपको लिखते रहिये

satish kundan said...

संगम जी,अनहद जी,खुशी जी ,रबिन्द्र जी और अभिन्न जी...आप सबों का धन्यबाद की मेरी रचना आपलोगों को पसंद आयी.आशा है आगे भी मेरे ब्लॉग पर आतें रहेंगे आप लोग ..

Pragya said...

मेरा हौसला बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.
माँ के ऋण से हम कभी मुक्त नहीं हो सकते. बहुत सुन्दर अभ्व्यक्ति..
आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूँ. बहत अच्छा लिखते हैं आप!!

dezy said...

VERY GOOD ,AAP ITNE ACCHE LIKH SAKTO HO YAKIN NAHI HOTA,MAA K LIYEA KUCH BHI LIKHO KUM HAI,LAKINJO AAPME LIKHA HAI WO KAFI HAD TK KARIB HAI.AAGE BHI YOUHI LIKHTE RAHO.

satish kundan said...

धन्यवाद प्रज्ञा जी...की आप मेरे ब्लॉग पर आईं,आशा है आगे भी आते रहेंगी.

satish kundan said...

हौसला बढ़ने के लिए धन्यवाद डेजी जी ...

Kusum Thakur said...

bahut hi bhav purna kavita hai.apaki pratikriya ke liye dhanyavad.Isi tarah blog par milate rahenge.

SAHITYIKA said...

bahut sahi likha hai maa ke baare me .. माँ....तुम्हे कैसे बांधू मैं शब्दों में......
हर शब्द तुम्हारी दासी है...
ye 2 lines bahut hi badhiya hai..
meri or se maa per 4 panktiyan..

मां होती है क्या
कितना कठिन ये बताना
माता की मूरत को
कितना कठिन है शब्दों में यूँ ढाल पाना..

divya said...

sachmuch me ma ka hamare jiwan me jo asthan hai wo sayad hi kavi kisi ka hoga.ma hi hamari jindgi hai unke bina sab adhura sa lagta hai.

Poonam Agrawal said...

Maa ki mahima aprampaar ...aur aapne use shabdo ke jariye hum tak pahuchane ka prayaas kiya....badhai

satish kundan said...

कुसुम जी,साहितिका जी ,दिव्या जी और पूनम जी आप सभी का धन्यबाद....आशा है आगे भी मेरे ब्लॉग पर आतें रहेंगी..