Tuesday, September 1, 2009

"क्योँ ".....



















क्यों
बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!

क्यों ख्वाबो में भी तेरी यादों को ढूंढ़ता है..... मेरा मन!


परछाइयां
जो दिखती है मेरी
कभी
जो उजालों में;

क्यों तेरे होने का एहसास करा जाता है... मेरा मन!

बहुत सोचा की तेरा साथ एक इतेफाक था;


क्यों आज भी तेरी याद हर ख़ुशी और गम में दिला जाता है...मेरा मन!


परेशां हूँ मैं इस क्यों से जबसे छुटा है तेरा साथ;


क्यों आज तक न दूँढ पाया इस "क्योँ " का जबाब.... मेरा मन!

क्यों बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!

क्यों ख्वाबो में भी तेरी यादों को ढूंढ़ता है..... मेरा मन!