Tuesday, September 1, 2009

"क्योँ ".....



















क्यों
बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!

क्यों ख्वाबो में भी तेरी यादों को ढूंढ़ता है..... मेरा मन!


परछाइयां
जो दिखती है मेरी
कभी
जो उजालों में;

क्यों तेरे होने का एहसास करा जाता है... मेरा मन!

बहुत सोचा की तेरा साथ एक इतेफाक था;


क्यों आज भी तेरी याद हर ख़ुशी और गम में दिला जाता है...मेरा मन!


परेशां हूँ मैं इस क्यों से जबसे छुटा है तेरा साथ;


क्यों आज तक न दूँढ पाया इस "क्योँ " का जबाब.... मेरा मन!

क्यों बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!

क्यों ख्वाबो में भी तेरी यादों को ढूंढ़ता है..... मेरा मन!

11 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

परेशां हूँ मैं इस क्यों से जबसे छुटा है तेरा साथ;
क्यों आज तक न दूँढ पाया
इस "क्योँ " का जबाब.... मेरा मन!
क्यों बेकल सा हुआ जाता है....मेरा मन!


वाह....।
बहुत खूब लिखा है आपने।
बधाई!

Babli said...

बहुत ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना काबिले तारीफ है! बहुत दिनों बाद आपका बढ़िया रचना पढने को मिला! लिखते रहिये!
मैंने शायरी पोस्ट की है आज और कविता भी पढियेगा वक्त मिलने से!

future mantra said...

Nice post. It is always good to see people expressing themselves in different ways.

Since you seem to be associated with Management, I would like to suggest you a new magazine - PEOPLE MATTERS started by an ISB Alumni, which was suggested to me by a friend and which I have found very useful.

It deals with various important aspects of management, especially those related to Leadership & People Management, which the mainstream business publications often ignore.

It's also relatively cheap. I guess its annual subscription is about Rs. 400 (US$ 8 approx) which is even less than the cost of a standard Pizza.

Their last issue had an enlightening article by Robert Kaplan (the co-founder of Balanced Scorecard method, if you remember) where he talks about how organisations can create opportunities out of current economic downturn.

I got its subscription online through their website: http://www.peoplematters.in

If you like the magazine, kindly refer it to your friends or colleagues in the organization you work. They may be interested in subscribing to it.

Thanks

vandana said...

बहुत सोचा की तेरा साथ एक इतेफाक था;

क्यों आज भी तेरी याद हर ख़ुशी और गम में दिला जाता है...मेरा मन!

waah...........bahut hi umda bhav..........ek tees ko ukerte bhav........gahan abhivyakti.

vandana said...

bahut hi khoobsoorat rachnaye hai sabhi koshish karoongi or bhi padhoon apke blog par akar achha laga ..thanks

raj said...

बहुत सोचा की तेरा साथ एक इतेफाक था;
bahut khoob...kahi itfaq se milna teri aadat to nahi....kafi der baad apne likha..par bahut achha....

दिल दुखता है... said...

shaddo ko kavita main khoob firoya hai... bahut khoob badiya

दिल दुखता है... said...

अच्छी नज्म.... दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं

sharan said...

very nice poem written by u infact ur all poem is so beutiful.
how r u and hows ur study going क्यों तेरे होने का एहसास करा जाता है... मेरा मन!
बहुत सोचा की तेरा साथ एक इतेफाक था;
so beutiful

sharan said...

very nice poem written by u infact ur all poem is so beutiful.
how r u and hows ur study going क्यों तेरे होने का एहसास करा जाता है... मेरा मन!
बहुत सोचा की तेरा साथ एक इतेफाक था;
so beutiful

www.जीवन के अनुभव said...

sundar aur sachchi abhivyakti.